सर्वपितृ अमावस्या 2025: गीता और गरुड़ पुराण में वर्णित महत्व

 

7 सितंबर 2025 से आरंभ हो रहा श्राद्ध पक्ष 21 सितंबर 2025 को सर्वपितृ अमावस्या और सूर्य ग्रहण के संयोग में समाप्त होगा। यह 16 दिवसीय काल हिंदू धर्म में पितृ तर्पण और श्राद्ध के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।


शास्त्रों का आधार

1. गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प में कहा गया है—

“यः पितॄन् तर्पयेत् भक्त्या सर्वान् विधिवदामलः।
स पितॄन् तर्पयन् तस्मात् प्रीतो भवति सर्वदा॥”

अर्थात् जो व्यक्ति श्रद्धा और विधिपूर्वक पितरों का तर्पण करता है, वे पितर सदैव प्रसन्न रहते हैं।


2. श्रीमद्भगवद्गीता

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (अध्याय 9, श्लोक 25) में पितृ लोक के विषय में कहा है—

“यान्ति देवव्रता देवान् पितृ़न् यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥”

अर्थात देवताओं की उपासना करने वाले देव लोक में जाते हैं, पितरों का पूजन करने वाले पितृ लोक को प्राप्त होते हैं, और मेरी भक्ति करने वाले मेरे पास आते हैं।

इस श्लोक से स्पष्ट है कि पितरों की उपासना करने से उनका लोक प्राप्त होता है और वे तृप्त होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं।

सर्वपितृ अमावस्या 2025: गीता और गरुड़ पुराण में वर्णित महत्व


3. मनुस्मृति

मनुस्मृति (3/203) में कहा गया है—

“श्राद्धेन पितरः तृप्ता देवा तृप्ता भवन्ति च।”

अर्थात जब पितर श्राद्ध से प्रसन्न होते हैं तो देवता भी तृप्त होते हैं और घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है।


सर्वपितृ अमावस्या का महत्व

  • यह पितरों की विदाई का अंतिम दिन है।
  • ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों का श्राद्ध इस दिन किया जाता है।
  • गीता का पाठ, विशेषकर अध्याय 2 और अध्याय 7, पितरों की आत्मा की शांति के लिए सर्वोत्तम है।
  • तर्पण और पिंडदान के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान देना अनिवार्य माना गया है।

सर्वपितृ अमावस्या 2025: शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध विधि और महत्व

वर्जनाएं (शास्त्रोक्त नियम)

गरुड़ पुराण और धर्मशास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन निम्न वस्तुओं का सेवन वर्जित है:

  • शराब, मांसाहार
  • बैंगन, प्याज, लहसुन
  • बासी भोजन, काला नमक, मूली, मसूर दाल

सर्वपितृ अमावस्या केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि शास्त्रों द्वारा प्रमाणित पितरों का स्मरण और उनके आशीर्वाद का उत्सव है। गीता और गरुड़ पुराण जैसे ग्रंथों में स्पष्ट है कि पितरों को तर्पण और श्राद्ध से संतुष्ट करना न केवल पितृ ऋण से मुक्ति दिलाता है, बल्कि देवताओं को भी प्रसन्न करता है।