बसंत पंचमी पर माता सरस्वती और भगवान कृष्ण का दिव्य मिलन: बांसुरी और वीणा की अमर लीला
चकित चितव मात पहिचानी
बांसुरी धुन पै वीणा थामी
लेखक:
राजेन्द्र मोहन शर्मा
वरिष्ठ साहित्यकार एवं पौराणिक आख्यान विशेषज्ञ
🔱 बसंत पंचमी का शास्त्रीय और आध्यात्मिक महत्व
सांदीपनि ऋषि का आश्रम उस दिव्य वातावरण में डूबा हुआ था, जहां बसंत पंचमी का दिन केवल ऋतुओं के परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि माता सरस्वती के प्राकट्य और आराधना का महापर्व था।
शास्त्रों में वर्णित है कि माघ शुक्ल पंचमी को वाणी, विद्या और संगीत की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का जन्म हुआ इसी दिन बसंत पंचमी मनाई जाती है।
📜 पुराणों में वर्णित मान्यता
कुछ पुराणों और लोक-परंपराओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि इस दिन माता सरस्वती की प्रथम पूजा स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने की थी, जिससे इस पर्व की आध्यात्मिक गरिमा और अधिक गहन हो जाती है।

🏛️ सांदीपनि ऋषि का आश्रम और विद्या का वातावरण
आश्रम प्रांगण में माता सरस्वती की प्रतिमा वेदी पर विराजमान थी—
श्वेत वस्त्र, कमलासन, हाथों में वीणा और नेत्रों में ज्ञान की करुणा।
श्वेत परिधान में बैठे शिष्य वातावरण को भक्तिमय बना रहे थे।
गुरु सांदीपनि ने निर्देश दिया कि प्रत्येक शिष्य अपनी भावना से बसंत पंचमी पर माता वाग्देवी की स्तुति करे।
🎶 शिष्यों की स्तुति और साधना
वरिष्ठ शिष्यों ने मंत्र, श्लोक और भजनों से बसंत पंचमी पर वातावरण को गुंजायमान कर दिया।
पूरा आश्रम सरस्वतीमय हो उठा।
🦚 मथुरा से आए बालक कृष्ण का मौन
उसी समय मथुरा से आए एक नवागंतुक बालक—कृष्ण—आश्रम के एक कोने में शांत खड़े थे।
उनकी आंखों में गहराई थी, मुस्कान में अद्भुत आकर्षण।
गुरु सांदीपनि ने संकेत से उन्हें बैठने को कहा, यह सोचकर कि उन्हें अभी समय दिया जाए।
🎵 जब कृष्ण उठे: दिव्यता का प्राकट्य
परंतु तभी कृष्ण उठ खड़े हुए।
उनका उठना साधारण नहीं था—मानो किसी दिव्य चेतना का प्राकट्य हो।
वे सीधे माता सरस्वती की वीणा के समक्ष जा खड़े हुए।
पूरा आश्रम स्तब्ध हो गया।
👁️ गुरु और शिष्य का मौन संवाद
गुरु सांदीपनि के नेत्रों में आश्चर्य था।
नेत्रों से संवाद हुआ।
अनुमति मिली।
🎶 बांसुरी की प्रथम धुन और वीणा का स्पर्श
कृष्ण ने बांसुरी अधरों से लगाई।
पहली धुन निकली—मधुर, गहन, मानो सृष्टि की प्रथम स्वर-लहरी।
वह धुन माता की वीणा की तारों को छू गई—
मानो बांसुरी ने वीणा की आत्मा को जगा दिया हो।
📖 गीता का शास्त्रीय संकेत
यह केवल संगीत नहीं था।
यह कृष्ण की वेणु-कला और सरस्वती की वीणा-शक्ति का दिव्य संगम था।
स्वयं श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं—
“ऋतूनां कुसुमाकरः”
अर्थात् ऋतुओं में मैं बसंत हूं।
और बसंत पंचमी ही सरस्वती का प्राकट्य-दिवस है।
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🌸 सरस्वती स्तुति और भक्ति का चरम
कृष्ण ने पहले माता की स्तुति की—स्वरों से, भावों से।
हर तान में वाणी की मधुरता, बुद्धि की ज्योति और संगीत की दिव्यता समाहित थी।
🙏 भजनों की झड़ी और भावविभोर आश्रम
इसके बाद बसंत पंचमी के पवन अवसर पर भजनों की झड़ी लग गई।
शिष्य भावविभोर हो उठे।
गुरु सांदीपनि का हृदय गर्व से भर गया।
🌼 माता सरस्वती की दिव्य पहचान
तभी वह क्षण आया—
माता सरस्वती का स्वरूप सजीव हो उठा।
पलकें झुकीं।
नेत्रों में पहचान की चमक उभरी।
🕉️ विष्णु अवतार का साक्षात्कार
माता ने पहचान लिया—
यह कोई साधारण बालक नहीं।
यह स्वयं भगवान विष्णु का अवतार श्रीकृष्ण हैं।
जिनकी बांसुरी में ब्रह्मांड की लय है।
जिनकी भक्ति में विद्या का मूल है।
🙏 जब देवी ने भगवान को प्रणाम किया
माता सरस्वती ने वीणा को थामते हुए, करबद्ध होकर, श्रीकृष्ण को प्रणाम किया—
मानो कह रही हों:
“हे माधव,
तुम्हारी बांसुरी ने मेरी वीणा को जागृत किया।
तुम्हारी भक्ति ही मेरी पूजा का आधार है।”
🌺 दिव्य क्षण और आश्रम का आलोक
बसंत पंचमी के उस क्षण में आश्रम दिव्य हो उठा।
फूल झूम उठे।
पक्षी चहक उठे।
गुरु सांदीपनि की आंखें नम हो गईं।
यह केवल कथा नहीं थी—
यह भक्ति की पराकाष्ठा थी।
🪔 बसंत पंचमी की अमर सनातन लीला
और तभी से बसंत पंचमी का यह प्रसंग अमर हो गया—
जहां सरस्वती की विद्या, कृष्ण की बांसुरी और वसंत की मधुरता
एक होकर सनातन चेतना का संदेश देती हैं।