सकट चौथ व्रत आज: जानें चंद्र दर्शन और अर्घ्य का मुहूर्त, कथा व विधान

माघ माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आज सकट चौथ का पावन व्रत श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि तथा परिवार की खुशहाली के लिए किया जाता है। सनातन धर्म की परंपरा में सकट चौथ को संकष्टी चौथ, तिलकुटा चौथ और माघ कृष्ण चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है।

शास्त्रों में वर्णित है कि सकट चौथ के दिन भगवान गणेश के भालचंद्र स्वरूप की उपासना करने से जीवन के सभी विघ्न और संकट दूर होते हैं। यही कारण है कि यह व्रत मातृत्व, त्याग और संकल्प का प्रतीक माना गया है।


सकट चौथ व्रत आज क्यों विशेष

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सकट चौथ का व्रत चंद्र दर्शन के बिना अधूरा माना जाता है। इस व्रत में दिनभर निर्जल उपवास रखकर रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। चंद्रमा मन का कारक है और गणेश बुद्धि के देवता हैं, इसलिए सकट चौथ मन और बुद्धि के संतुलन का भी व्रत है।

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सकट चौथ 2026: तिथि और चंद्र दर्शन का समय

  • चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 6 जनवरी 2026, सुबह 8:01 बजे
  • चतुर्थी तिथि समाप्त: 7 जनवरी 2026, सुबह 6:52 बजे
  • चंद्रोदय (Moon Rise Time): रात लगभग 8:54 बजे

इस वर्ष सकट चौथ पर चंद्रोदय चतुर्थी तिथि में ही हो रहा है, इसलिए व्रत आज ही रखा जा रहा है। चंद्र दर्शन के पश्चात अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण किया जाएगा।


सकट चौथ पर बनने वाले शुभ योग

आज सकट चौथ के दिन तीन शुभ योगों का संयोग बन रहा है—
सर्वार्थ सिद्धि योग, प्रीति योग और आयुष्मान योग।
शास्त्रों के अनुसार इन योगों में किया गया व्रत और पूजन कई गुना फलदायी होता है। विशेष रूप से सकट चौथ पर यह योग संतान सुख और पारिवारिक स्थिरता का संकेत देता है।


सकट चौथ व्रत का शास्त्रोक्त विधान

प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। दिनभर जल ग्रहण नहीं किया जाता और मन, वाणी व कर्म से संयम रखा जाता है। सायंकाल स्नान के बाद गणेश पूजन किया जाता है।

पूजन में तिल और गुड़ से बने नैवेद्य का विशेष महत्व है। शास्त्रों में बताया गया है कि सकट चौथ पर तिल पापक्षय का और गुड़ शुभ फल का प्रतीक है। दीप, धूप और पुष्प अर्पित कर गणेश का ध्यान किया जाता है।

रात्रि में चंद्रमा को जल, अक्षत और तिल अर्पित कर अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।


सकट चौथ की कथा का सार

सकट चौथ की कथाओं में एक ही मूल संदेश मिलता है—श्रद्धा और संकल्प। शास्त्रों में वर्णित कथाएं यह सिखाती हैं कि व्रत का फल तभी मिलता है जब वचन और कर्म में एकता हो। गणेश कृपालु हैं, लेकिन अहंकार और ईर्ष्या से किया गया व्रत निष्फल हो जाता है।

देवरानी–जेठानी और शिव–पार्वती से जुड़ी कथाएं यह स्पष्ट करती हैं कि सकट चौथ केवल संतान का व्रत नहीं, बल्कि संस्कार, संतोष और संयम का मार्ग है।

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सकट चौथ का आध्यात्मिक महत्व

ऋषि परंपरा में कहा गया है कि सकट चौथ के माध्यम से माता अपने संतान के लिए केवल लंबी आयु नहीं, बल्कि उत्तम बुद्धि और धर्मबुद्धि की कामना करती है। यह व्रत जीवन के आंतरिक संकटों—लोभ, क्रोध और असंतोष—को दूर करने की साधना भी है।

आज का सकट चौथ शुभ योगों, अनुकूल तिथि और चंद्र दर्शन के कारण विशेष फलदायी माना जा रहा है। श्रद्धा, नियम और विश्वास के साथ किया गया यह व्रत संतान की दीर्घायु, परिवार की खुशहाली और जीवन में स्थिरता प्रदान करता है।

बोलो सकट चौथ की जय।
श्री गणेश देव की जय।