“इस मंत्र का जप करने वाले के साथ मैं सदैव रहता हूँ” – श्रीकृष्ण
“हे भक्त! जब-जब तुम मुझे सच्चे भाव से पुकारते हो, मैं तुम्हारे समीप होता हूँ।
तुम्हारी सांसों में, तुम्हारे मन में, तुम्हारी हर धड़कन में…”
मेरा वचन
सनातन धर्म के पवित्र ग्रंथों में मैंने स्वयं यह वचन दिया है कि जो साधक एक विशेष मंत्र का जप करता है, मैं उसका सखा, रक्षक और मार्गदर्शक बनकर सदैव उसके साथ रहता हूँ।
उसके जीवन के दुख, क्लेश, भय और बाधाएँ दूर कर देता हूँ, जैसे सूर्य के सामने अंधकार स्वतः मिट जाता है।
ग्रंथों में प्रमाण
- महाभारत में द्रौपदी ने संकट की घड़ी में इस मंत्र का स्मरण किया और मैं तत्काल पहुँचा।
- श्रीमद्भगवद्गीता में मैंने कहा है – “जप यज्ञ सभी यज्ञों में श्रेष्ठ है”, क्योंकि जप सीधा मुझ तक पहुँचाता है।
- भागवत महापुराण में ऋषियों ने इसकी महिमा गाई है और इसे क्लेशनाशक (सभी क्लेश नाश करने वाला) कहा है।
जप की शास्त्रोक्त तैयारी
“भक्त! मंत्र जप केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि मेरा स्मरण और ध्यान है।”
- प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें।
- कुशा का आसन बिछाकर तुलसी की माला लें।
- गंगाजल से माला को पवित्र करें।
- पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
जप की विधि
- माला को दाहिने हाथ में रखें, अंगूठे और मध्यमा से मनके चलाएँ।
- हर मनके पर मंत्र का उच्चारण स्पष्ट, धीमे और भावपूर्ण करें।
- एक दिन में 108 बार जपने का नियम लें।
- जप करते समय मेरा रूप, मेरी लीलाएँ और मेरा नाम मन में बसाएँ।
जप के फल
“जो मुझे इस मंत्र से पुकारता है, मैं उसके जीवन में यह वरदान देता हूँ:”
- सभी दुख, भय और क्लेश का अंत
- मन की शांति और स्थिरता
- घर-परिवार में सुख और मंगल
- आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष का मार्ग
और अब वह पावन मंत्र…
जिसकी महिमा तुमने पढ़ी, जिसके बारे में मैंने स्वयं वचन दिया, वह है –
“कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥”
“भक्त! इसे भावपूर्वक जपो… मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा। तुम्हारे सभी क्लेश हर लूँगा।”