ऋषि पंचमी व्रत: पूर्व जन्म के पापों से मुक्ति के लिए पूजा विधि, कथा और मंत्र
सनातन धर्म में व्रत-त्योहार केवल आस्था का ही नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और ऋषियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का साधन भी हैं। इन्हीं व्रतों में भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाया जाने वाला ऋषि पंचमी व्रत विशेष स्थान रखता है।
ऋषि पंचमी का महत्त्व
भविष्यपुराण, पद्मपुराण तथा धर्मसिन्धु जैसे ग्रंथों में ऋषि पंचमी का महात्म्य वर्णित है। इस व्रत का पालन स्त्री-पुरुष दोनों को करना चाहिए। यह व्रत विशेषतः स्त्रियों के लिए निषिद्ध दोषों से मुक्त होने और सप्तऋषियों की कृपा प्राप्त करने का उपाय माना गया है।
सनातन परंपरा के अनुसार इस दिन सप्तऋषि—कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, वशिष्ठ, जमदग्नि और गौतम—तथा उनकी पत्नियाँ अर्थात् अर्ष्यशक्ति (अरुंधती) की पूजा की जाती है।
व्रत-विधि
भाद्रपद शुक्ल पंचमी को प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
गंगाजी की मिट्टी, गोबर, तुलसी की जड़ की मिट्टी, पीपल की जड़ की मिट्टी, गोपी चंदन, तिल, आँवला, गंगाजल और गोमूत्र मिलाकर शुद्धिकरण करें।
१०८ बार हाथ धोएँ, १०८ बार दाँत साफ करें, १०८ बार कुल्ले करें, १०८ पत्ते ऊँगा (अरुंधती प्रतीक) सिर पर रखें और १०८ बार घंटी बजाते हुए स्नान करें।
गंगाजी अथवा घर में स्नान कर नए वस्त्र धारण कर पूजा करें।
सबसे पहले गणेशजी, कलश, नवग्रह और षोडश मातृका की पूजा करें। यह विधि “नवरात्र” में वर्णित है। इसके पश्चात् सप्तऋषि और अरुंधती की पूजा करनी चाहिए। एक पाटे पर ऊन और कुशा रखकर सप्तऋषि और अरुंधती की प्रतिमाएँ स्थापित करें।
उनका पूजन जल, पंचामृत, मौली, रोली, चंदन, चावल, पुष्प, प्रसाद, फल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची से करें। दक्षिणा अर्पित कर कथा सुनें और अंत में आरती करें।
इस दिन चार केले, घी, चीनी और रुपया मिलाकर ब्राह्मण को अर्पित करना चाहिए।
व्रती को केवल एक समय भोजन करना चाहिए। भोजन में अनाज, नमक, चीनी, दूध, दही, हल से जुती वस्तुएँ वर्जित हैं। केवल फल और मेवों का सेवन करना चाहिए।
पौराणिक कथा
पद्मपुराण में एक कथा आती है।
पूर्वकाल में एक ब्राह्मण था जिसकी पत्नी मासिक धर्म के नियमों का पालन किए बिना ही धार्मिक कार्यों में संलग्न हो जाती थी। इससे वह अपवित्र हो गई। अगले जन्म में वह स्त्री एक दरिद्र परिवार में जन्मी और अनेक दुखों से पीड़ित रही।
एक दिन उसने अपने दुखों का कारण जानने के लिए ऋषि से प्रश्न किया। तब नारद मुनि ने उसे बताया—
“हे सुभगे! पूर्व जन्म में तुमने स्त्री-धर्म का पालन नहीं किया, इसलिए यह स्थिति उत्पन्न हुई है। यदि तुम अपने पाप से मुक्त होना चाहो, तो भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन ऋषि पंचमी व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे पूर्व जन्म के पाप नष्ट होंगे और तुम पवित्रता को प्राप्त करोगी।”
नारद जी के वचनों के अनुसार उसने यह व्रत किया और शीघ्र ही उसके सभी पाप नष्ट हो गए। वह पुण्यवती और सात्त्विक जीवन प्राप्त करने वाली बनी।
सप्तऋषि स्तुति मंत्र
अत्रिर्वसिष्ठो भरद्वाजो गौतमोऽथ कश्यपः।
जमदग्निर्मुनिः श्रीमान् विश्वामित्रस्तथैव च॥
सप्तर्षयः स्मृताः पुण्याः पूजिताः सर्वकर्मसु।
एषां प्रसादात् सर्वं मे शुभं स्यात्सर्वतो ध्रुवम्॥