देहरादून के शिवार्थ जैन और कृधा गुप्ता बने ‘मधुरम मधुरम – राधा कृष्ण फोटो कॉन्टेस्ट 2025’ के विजेता
ऋषियों की अमरवाणी द्वारा आयोजित भव्य प्रतियोगिता “मधुरम मधुरम – राधा कृष्ण फोटो कॉन्टेस्ट 2025” के परिणाम घोषित कर दिए गए। इस वर्ष प्रतियोगिता में देशभर से 350 से अधिक प्रविष्टियां प्राप्त हुईं, जिनमें बालकों और बालिकाओं ने राधा–कृष्ण का रूप धारण कर अपनी प्रतिभा और भक्ति का अनूठा प्रदर्शन किया। खास बात यह रही कि दोनों मुख्य श्रेणियों — बाल गोपाल और किशोरी जी — में 1 वर्ष से कम उम्र के प्रतिभागियों ने प्रथम स्थान हासिल कर सबका दिल जीत लिया।
बाल गोपाल श्रेणी में देहरादून के 7 माह के शिवार्थ जैन ने पहला स्थान प्राप्त किया। द्वितीय स्थान पर कृष जोशी और तृतीय स्थान पर सव्य शर्मा रहे।
वहीं किशोरी जी श्रेणी में देहरादून की ही 2 माह की कृधा गुप्ता प्रथम स्थान पर रहीं। उनके बाद द्वितीय स्थान पर विदिशा नेगी और तृतीय स्थान पर अद्रिका शर्मा ने सफलता पाई।
इस प्रतियोगिता का उद्देश्य 0 से 11 वर्ष तक के बच्चों में सनातन संस्कृति के प्रति प्रेम और भक्ति का भाव विकसित करना था। प्रतिभागियों ने राधा–कृष्ण का रूप लेने में अपनी पूरी मेहनत झोंक दी। कहीं गहनों और वेशभूषा ने मन मोह लिया तो कहीं मासूम मुस्कुराहट ने हर किसी का दिल जीत लिया।
प्रतियोगिता की जूरी में तीन प्रतिष्ठित हस्तियां शामिल थीं —
- निमिषा शर्मा, HOD of English
- डॉ. अनुराधा शर्मा, प्रोफेसर ऑफ साइकोलॉजी
- कृष्णा ओझा, इवेंट प्लानर
जूरी ने इस वर्ष विशेष रूप से 1 वर्ष से कम उम्र के प्रतिभागियों को विजेता घोषित करने का निर्णय लिया। उनका तर्क था कि इन बच्चों की माताओं ने न केवल इस दिन को यादगार बनाया बल्कि इतनी कम उम्र से ही बच्चों में सनातन संस्कारों को संजोने का प्रयास किया, जो सराहनीय है।
- राजेन्द्र मोहन शर्मा, Editor-in-Chief, ऋषियों की अमरवाणी ने कहा,
“यह प्रतियोगिता केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों में हमारी परंपरा और भक्ति को संजोने का प्रयास है।” - सरोज शर्मा, CEO, ऋषियों की अमरवाणी ने घोषणा की,
“हम जल्द ही करवा चौथ पर माताओं को ऐसा मंच देंगे, जहां वे भी अपनी कला और प्रतिभा दुनिया के सामने रख सकें। इसके अलावा नवरात्रि गरबा, मकर संक्रांति पतंगबाजी और होली स्पेशल कार्यक्रमों की भी योजना है।” - सुमन शर्मा, COO ने कहा,
“अब हम पॉडकास्ट के माध्यम से इस सांस्कृतिक परिवार को और बड़ा बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, ताकि हर घर तक ऋषियों की अमरवाणी की गूंज पहुंचे।”
इस प्रतियोगिता ने साबित किया कि यदि मंच और अवसर मिले तो बच्चे अपनी मासूमियत के साथ-साथ संस्कृति और आस्था को भी खूबसूरती से जीवित कर सकते हैं। यह आयोजन सिर्फ प्रतियोगिता नहीं, बल्कि एक भावनात्मक उत्सव बन गया जिसने माता-पिता और बच्चों को मिलकर परंपरा से जोड़ दिया।