जन्माष्टमी विशेष: एक अलौकिक जन्म की अविस्मरणीय गाथा! पढ़ने मात्र से मिलता है पुण्य, होता है भाग्योदय

5252 वर्ष पूर्व भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रात के बारह बजे मथुरा के राजा कंस की जेल में वासुदेव की पत्नी, देवी देवकी, के गर्भ से सोलह कलाओं से युक्त भगवान्‌ श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। इस तिथि का रोहिणी नक्षत्र विशेष महत्व रखता है।

जैसा कि आप जानते हैं कि इस दिन पूरे देश के मन्दिरों का श्रृंगार किया जाता है, झाँकियाँ सजाई जाती हैं, और भगवान्‌ कृष्ण का भव्य झुला तैयार किया जाता है। साथ ही रात्रि बारह बजे शंख और घंटों की आवाज से श्रीकृष्ण के जन्म की खुशखबरी चारों दिशाओं में फैलती है। भक्तजन व्रत रखते हैं, आरती उतारते हैं, प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करते हैं।

ऋषियों मुनियों ने आम जनमानस तक इस कथा को पहुंचने के लिए अनेकों पुराणों, पुस्तकों में इसका उल्लेख किया है। तो आइए जानते हैं उस रात की मूल कथा को जब भगवान श्री कृष्ण ने धरती पर अवतरण लिया।

द्वापर युग में जब धरती पर राक्षसों का अत्याचार बहुत बढ़ गया, तब पृथ्वी ने एक गाय का रूप धारण करके ब्रह्माजी को अपनी व्यथा सुनाई। ब्रह्माजी के साथ सभी देवता, क्षीर सागर में भगवान विष्णु के पास पहुँचे। उस समय भगवान अनंत शैय्या पर योगनिद्रा में थे। देवताओं की स्तुति से उनकी निद्रा भंग हुई और उन्होंने आश्वासन दिया कि वे जल्द ही धरती पर आएंगे। इसके बाद, सभी देवता ब्रज मंडल में नंद-यशोदा और गोप-गोपियों के रूप में जन्म लेने लगे।

कंस का आतंक और आकाशवाणी का रहस्य

इसी बीच, मथुरा में राजा उग्रसेन के पुत्र कंस ने उन्हें बलपूर्वक सिंहासन से हटाकर स्वयं राजपाठ संभाल लिया। उसकी बहन देवकी का विवाह वासुदेव से हुआ। जब कंस, देवकी को विदा कर रहा था, तभी एक आकाशवाणी हुई:

“हे कंस! जिस देवकी को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसका आठवां पुत्र ही तेरा काल बनेगा।”

इस भविष्यवाणी ने कंस को भयभीत कर दिया। उसने क्रोध में आकर देवकी को मारने का प्रयास किया, लेकिन वासुदेव के समझाने पर उसने देवकी को जीवनदान दिया और उन्हें कारागार में डाल दिया।

कंस ने नारदजी के कहने पर, देवकी की हर संतान को मारना शुरू कर दिया। एक-एक करके उसने सात शिशुओं को निर्दयता से मौत के घाट उतार दिया।

आधी रात का चमत्कार और श्रीकृष्ण का जन्म

और फिर वह क्षण आया जिसका सभी को इंतज़ार था। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र में, कारागार के अंधकार में एक दिव्य प्रकाश फैला और श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर भगवान ने वासुदेव को आदेश दिया कि वे उन्हें गोकुल में नंद बाबा के यहाँ पहुँचा दें और उनकी नवजात कन्या को मथुरा ले आएं।

जैसे ही वासुदेव ने आदेश का पालन करने का निश्चय किया, चमत्कार होने लगे। उनकी हथकड़ियाँ खुल गईं, जेल के दरवाज़े अपने आप खुल गए और पहरेदार गहरी नींद में सो गए। वासुदेव एक टोकरे में नन्हे श्री कृष्ण को लेकर यमुना नदी पार करने चले। यमुना ने भी उनके चरणों को स्पर्श करने के लिए अपने जलस्तर को बढ़ा दिया, लेकिन जब भगवान ने अपने पैर नीचे किए, तो वह शांत हो गई।

गोकुल पहुँचकर वासुदेव ने कृष्ण को माता यशोदा के पास सुला दिया और उनकी कन्या को लेकर वापस मथुरा आ गए।

कंस को जब कन्या के जन्म की सूचना मिली, तो वह उसे मारने दौड़ा। लेकिन वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई और देवी का रूप धारण कर बोली,

“मुझे मारकर क्या लाभ होगा, कंस? तेरा काल तो जन्म ले चुका है!”

यह सुनकर कंस व्याकुल हो गया और उसने श्रीकृष्ण को मारने के लिए कई राक्षसों को भेजा, लेकिन श्रीकृष्ण ने अपनी बाल लीलाओं में ही उन सभी का संहार कर दिया। बड़े होकर, उन्होंने कंस का वध कर उग्रसेन को पुनः राजगद्दी पर बैठाया।

आज भी हम हर वर्ष इस अद्भुत जन्म की खुशी में जन्माष्टमी का पर्व मनाते हैं, जो हमें यह याद दिलाता है कि

जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ेगा, तब-तब भगवान स्वयं उसकी रक्षा के लिए अवतार लेंगे।