ये पांच दोष लाते हैं दरिद्रता… इसलिए नहीं ठहरती इनके पास लक्ष्म

मां लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं हैं, वे वैभव, ऐश्वर्य, सौंदर्य, शुभता और समग्र समृद्धि की अधिष्ठात्री हैं। हर मनुष्य उनके स्थायी वास की कामना करता है, परंतु गीता के अमर उपदेशों में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि लक्ष्मी वहां नहीं ठहरती जहां जीवन में कुछ विशेष दोष हों। यह केवल धार्मिक चेतावनी नहीं, बल्कि एक गहन जीवन-दर्शन है।

गीता हमें यह सिखाती है कि लक्ष्मी भक्ति, अनुशासन, कर्मठता और आत्मनियंत्रण की प्रतीक हैं। वे उन स्थानों पर वास नहीं करतीं जहां प्रमाद, आलस्य, अधर्म और विषयवासना का साम्राज्य होता है। इस ब्लॉग में हम विस्तार से जानेंगे कि गीता किन दोषों को लक्ष्मी के वियोग का कारण बताती है और उनसे कैसे बचा जाए।


1. प्रमादी व्यक्ति – लापरवाही से खुलता दरिद्रता का द्वार

श्लोक प्रेरणा:
“प्रमादो ह्ययमृत्युनां द्वारं नाशस्य चात्मनः।”
(गीता 2.63 भावार्थानुसार)

प्रमादी वह है जो समय का अपमान करता है, अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ता है और जीवन को यूं ही बह जाने देता है। ऐसा व्यक्ति लक्ष्मी को आकर्षित नहीं कर सकता क्योंकि उसकी ऊर्जा और संकल्प दुर्बल हो चुकी होती है। प्रमाद दरिद्रता की प्रथम सीढ़ी है, जिससे बचना आवश्यक है।


2. आलसी व्यक्ति – तमोगुणी प्रवृत्ति का बंधन

श्लोक प्रेरणा:
“अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥”
(गीता 14.13)

आलस्य तमोगुण की उपज है जो आत्मा को जड़ता में जकड़ लेता है। जो श्रम से दूर भागता है, उसे लक्ष्मी त्याग देती हैं। मां लक्ष्मी केवल कर्मशील, जागरूक और परिश्रमी जनों पर प्रसन्न होती हैं। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ का भाव जीवन में उतारने वाला ही समृद्धि का पात्र बनता है।


3. नास्तिक व्यक्ति – ईश्वरविहीन जीवन में नहीं बसती लक्ष्मी

श्लोक प्रेरणा:
“अश्रद्दद्धाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युंसंसारवर्त्मनि॥”
(गीता 9.3)

जो श्रद्धाहीन है, जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता, वह आत्मा की वास्तविक शक्ति को नहीं पहचान पाता। ऐसा व्यक्ति केवल भौतिकता में उलझा रहता है, और लक्ष्मी — जो दिव्यता की अधिष्ठात्री हैं — उससे दूर हो जाती हैं। श्रद्धा ही वह पुल है जो भक्ति से समृद्धि की ओर ले जाता है।


4. अजितेन्द्रिय व्यक्ति – इंद्रिय-भोग की पराधीनता

श्लोक प्रेरणा:
“इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥”
(गीता 2.67)

जिसने अपनी इंद्रियों को वश में नहीं किया, वह चंचल मन और विकारों का दास बन जाता है। ऐसे व्यक्ति की चित्तवृत्ति अस्थिर रहती है, जिससे निर्णय और कर्म दोनों प्रभावित होते हैं। लक्ष्मी की कृपा एकाग्रता और संयम में निहित होती है, न कि विषय-भोग में।


5. उत्साहहीन व्यक्ति – निःशक्ति जीवन में समृद्धि नहीं ठहरती

श्लोक प्रेरणा:
“न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥”
(गीता 3.5)

जीवन में उत्साह और प्रेरणा ही प्रगति का मूल स्रोत हैं। जो व्यक्ति निराशा, हताशा और अकर्मण्यता से घिरा रहता है, वह आत्मबल को खो देता है। उत्साह ही वह शक्ति है जिससे असंभव भी संभव होता है — और मां लक्ष्मी उसी उत्साही के द्वार पर आती हैं।


समापन विचार: लक्ष्मी का स्थायी वास कैसे हो

श्रीमद्भगवद्गीता हमें जीवन के उन मार्गों की ओर ले जाती है जो केवल आत्मिक नहीं, भौतिक समृद्धि के लिए भी अनिवार्य हैं। मां लक्ष्मी का स्थायी वास उसी के यहां होता है जो —

  • कर्मठ है, प्रमादी नहीं
  • परिश्रमी है, आलसी नहीं
  • श्रद्धावान है, नास्तिक नहीं
  • संयमी है, वासनाओं का दास नहीं
  • उत्साही है, निराश नहीं

इन गुणों को आत्मसात कर हम न केवल लक्ष्मी की कृपा के अधिकारी बनते हैं, बल्कि एक संतुलित, सुखमय और सफल जीवन की ओर अग्रसर होते हैं।