आदि शंकराचार्य जयंती – सनातन धर्म के अद्वैत दीपस्तंभ

“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः।”
– यह वाक्य न केवल एक दार्शनिक सिद्धांत है, बल्कि उस ऋषि की जीवन-वाणी है, जिसने कलियुग के अंधकार में पुनः वैदिक सूर्य को प्रतिष्ठित किया – जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

आज वैशाख शुक्ल पंचमी, वह पुण्य तिथि है जब भगवान शिव के अंशावतार रूप में केरल के कालड़ी ग्राम में माता आर्या देवी की कोख से एक दिव्य बालक ने जन्म लिया – जो आगे चलकर अद्वैत वेदान्त का प्राण बन गया।


शंकराचार्य: शिवस्वरूप ब्रह्मज्ञानी

शास्त्रों के अनुसार, आदि शंकराचार्य न केवल वेद-वेदांत के परम ज्ञाता थे, अपितु स्वयं भगवान शंकर का अवतार माने जाते हैं। उन्होंने मात्र 8 वर्ष की आयु में संन्यास लिया, 12 वर्ष में समस्त वेदों पर अधिकार प्राप्त किया, और 32 वर्ष की आयु में देह का त्याग कर ब्रह्मलीन हो गए।

उनकी संपूर्ण जीवन यात्रा एक सनातन मिशन थी – *”धर्म की पुनः स्थापना और अज्ञान के विनाश”।


शास्त्रोक्त शिक्षाएँ: अद्वैत वेदान्त का सार

आदि शंकराचार्य ने प्रस्थानत्रयी (उपनिषद्, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र) पर भाष्य लिखकर वैदिक धर्म की नींव को दृढ़ किया। उनकी शिक्षाओं का मूल तत्व अद्वैत है:

  1. अहं ब्रह्मास्मि – “मैं ही ब्रह्म हूँ।”
  2. तत्त्वमसि – “तू वही है।”
  3. सर्वं खल्विदं ब्रह्म – “यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है।”

इन वाक्यों में आत्मा और परमात्मा की एकता, माया की तात्कालिकता और ब्रह्म की परम सत्ता स्पष्ट होती है।


धर्म की रक्षा हेतु चार पीठों की स्थापना

आदि शंकराचार्य ने अखंड भारत की चार दिशाओं में चार मठ स्थापित किए:

  • उत्तर: ज्योतिर्मठ, बद्रीनाथ (ऋग्वेद)
  • दक्षिण: श्रृंगेरी मठ, कर्नाटक (यजुर्वेद)
  • पूर्व: गोवर्धन मठ, पुरी (अथर्ववेद)
  • पश्चिम: द्वारका शारदा मठ (सामवेद)

यह चार मठ आज भी सनातन धर्म की अखंड धारा को साधु-संन्यासियों और विद्वानों के माध्यम से प्रवाहित कर रहे हैं।


समाज के लिए संदेश

आदि शंकराचार्य का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने धर्म को सिर्फ कर्मकांड नहीं, बल्कि ज्ञान, भक्ति और वैराग्य से जोड़कर जनसाधारण को आत्मबोध की ओर प्रेरित किया।

उन्होंने कहा:

“मूढ़ः कश्चन वाञ्छत्यपि मरणं, जन्म पुनः पुनः मरणं पुनः पुनः।
शरणं गच्छ देवेशं, शंकरं लोकशंकरम्॥”

“जन्म और मरण के चक्र से मुक्ति का एकमात्र मार्ग है – आत्मबोध और ईश्वर में लीनता।”


सनातन जीवन में अद्वैत का स्थान

शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धांत ने यह बताया कि जाति, वर्ण, पंथ और परंपरा से परे हर जीवात्मा ब्रह्मस्वरूप है। इससे सामाजिक समरसता, आंतरिक शांति और वैचारिक उदारता को बल मिला।

उनकी रचनाएँ – विवेकचूडामणि, आत्मबोध, उपदेशसाहस्री, भज गोविन्दम् – आज भी सनातन साधकों के लिए दीपक के समान हैं।

शंकरं शंकराचार्यं केशवं बादरायणम्।
सूत्रभाष्यकृतौ वन्दे भगवन्तौ पुनः पुनः॥

आज उनकी जयंती पर हम संकल्प लें कि सनातन धर्म की मूल चेतना – आत्मबोध, वैराग्य और सेवा – को जीवन में उतारें।