रामानुजाचार्य जयंती – विषिष्टाद्वैत का अमर दीपक
“शरणागतों के लिए श्रीमन नारायण ही परम सहारा हैं।”
– यही भाव था उस दिव्य आत्मा का, जिसने वेदांत में भक्ति का अमृत घोलकर सम्पूर्ण भारत को श्रीरामभक्ति और विष्णु आराधना के मार्ग पर चलाया – भगवत रामानुजाचार्य।
जन्म और दिव्यता
तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में जन्मे रामानुजाचार्य जी को श्री महाविष्णु का अंश माना जाता है। उनके गुरु यामुनाचार्य का स्वप्न था – वेदांत में भक्ति का समावेश, जो रामानुज ने साक्षात करके दिखाया।
विषिष्टाद्वैत – वेदांत का भक्तिमय रूप
उन्होंने अद्वैत वेदांत में यह दृष्टि जोड़ी कि:
“जीव और ब्रह्म एक नहीं, किंतु अविनाशी संबंध में हैं। जीव ब्रह्म का अंश है, न कि पूर्ण ब्रह्म।”
विषिष्टाद्वैत के मूल तत्व:
- जीव – स्वतंत्र सत्ता, परंतु भगवद् अधीन।
- ईश्वर – नारायण, सर्वसमर्थ और कृपालु।
- भक्ति – मोक्ष का सर्वोत्तम मार्ग।
- प्रपत्ति (पूर्ण समर्पण) – श्रीराम या श्रीकृष्ण के चरणों में आत्मनिवेदन।
समाज-सुधारक संत
रामानुजाचार्य ने जातिवाद, अस्पृश्यता और अज्ञानता के विरुद्ध युद्ध किया। उन्होंने शूद्रों और महिलाओं को मंदिर ज्ञान व भक्ति में प्रवेश दिया।
कांचीपुरम के एक प्रसंग में उन्होंने स्वयं मंदिर के ब्राह्मणों को चुनौती देते हुए कहा:
“जहाँ भक्ति है, वहीं ब्रह्म है – वर्ण और जन्म से नहीं, भाव और सेवा से ईश्वर प्राप्त होते हैं।”
आचार्य की अमर लीला
रामानुजाचार्य ने 120 वर्ष तक जीवित रहकर 700 ग्रंथों की रचना की, जिनमें श्रीभाष्य, गीता भाष्य, वेदांत सार प्रमुख हैं। श्रीरंगम मंदिर में आज भी उनका देहधारी विग्रह विद्यमान है – चिरंजीवी की भाँति।
रामानुजं गुरुं वन्दे विष्णोः पादारविन्दयोः।
प्रपन्न जनतारकं भक्तिशास्त्रप्रवर्तकम्॥